1857 Ki Kranti in Hindi | 1857 Revolt in Hindi | 1857 की क्रांति

1857 Ki Kranti in Hindi: 1857 में भारत में एक शक्तिशाली जनविद्रोह उठ खड़ा हुआ और उसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की जड़े तक हिलाकर रख दी | इसका आरम्भ तो कंपनी की सेना के भारतीय सिपाहियों से हुआ, लेकिन जल्द ही इसने व्यापक रूप धारण कर लिया | लाखो लाख किसान, दस्तकार तथा सिपाही एक साल से अधिक समय तक बहादुरी से लड़ते रहे हुए अपनी उल्लेखनीय वीरता और बलिदानो से उन्होंने भारतीय इतिहास में एक शानदार अध्याय जोड़ा | आज हम आपको इस पोस्ट के माध्यम से 1857 Ki Kranti in Hindi 1857 Revolt in Hindi (1857 की क्रांति) के बारे में विस्तार से बताने जा रहें हैं |

1857 Ki Kranti in Hindi | 1857 Revolt in Hindi | 1857 की क्रांति

1857 Ki Kranti in Hindi


1857 Revolt in Hindi: 1857 का विद्रोह सिपाहियों के असंतोष का परिणाम मात्र नहीं था | वास्तव में यह ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के चरित्र, नीतियों और उसके कारण कंपनी के शासन के प्रति जनता के संचित अशंतोष का और विदेशी शासन के प्रति उनकी घृणा का परिणाम था | एक शताब्दी से भी अधिक समय तक अंग्रेजो ने इस देश पर धीरे-धीरे अपना अधिकार बढ़ाते जा रहे थे, और इस काल में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में विदेशी शासन के प्रति जन-अशंतोष तथा घृणा में वृद्धि होती रही | यही वह असंतोष था जो एक जनक्रांति के रूप में उभरा

 

1857 विद्रोह के कारण (Cause of 1857 Revolt)

 

#1 सैन्य विद्रोह की शुरुआत 

सैनिको के अंदर असंतोष के नीव अंग्रेजो ने 1764 के बक्सर के युद्ध के दौरान से ही रख दी थी | बक्सर का युद्ध 22 अक्टूबर 1764 के दौरान कंपनी के कुछ भारतीय सिपाही भारतीयों के पास चले गए | जिसके चलते अंग्रेजी सेना का नेतृत्व कर रहे हेक्टर मुनरो ने 24 भारतीय सिपाहियों को तोप से उडा दिया था

 

वेल्लोर का युद्ध 1806 - यह सेना में प्रथम धार्मिक विद्रोह था क्योंकि भारतीय सिपाहियों के माथे मर तिलक और पगड़ी बांधने पर रोक लगा दी गई थी और हैट पहनना अनिवार्य कर दिया गया था, जिसमे सूअर के बाल का तुर्रा (पंख) लगा था

 

डाकघर अधिनियम 1854 - उस समय के भारत के गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने सैनिकों की निशुल्क डाक सुविधा पर रोक लगा दी थी

 

लार्ड कैनिंग का सेना भर्ती अधिनियम 1856इस अधिनयम के तहत लार्ड कैनिंग ने भारतीय सिपाहियों को अंगेज अफसर की बात मानने को बाध्य कर दिया तथा इसी के दौरान चार्ल्स नेपियर ने भारतीय सैनिको को भाड़े का टट्टू कहा


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#2 आर्थिक कारण 

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के उद्योग और धंधो को नष्ट कर दिया तथा श्रमिकों से बलपूर्वक अधिक से अधिक श्रम कराकर उन्हें काम पारश्रमिक देना प्रारम्भ कर दिया | इसके अतिरिक्त अकाल बाढ़ की स्थिति में भारतियों की किसी भी प्रकार की सहायता नहीं की जाती थी और उन्हें उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता था

वर्ष 1813 में 1813 के एक्ट के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुक्त व्यापर की नीति अपना ली | इसके अंतर्गत ब्रिटिश व्यापारियों को आयात करने की पूरी छूट मिल गई | परंपरागत तकनीक से बानी हुई भारतीय वस्तुएं इसके सामने टिक नहीं सकीं और भारतीय शहरी हस्तशिल्प व्यापर को अकल्पनीय छति हुई

कंपनी ने खेती के सुधार पर बेहद कम खर्चा किया और अधिकतर लगान का प्रयोग कंपनी की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता था | ईस्ट इंडिया कंपनी के एक कानून के अंतर्गत भूमि हस्तानांतरण वैध हो जाने के कारण किसानो को अपनी भूमि से भी हाँथ धोना पड़ता था | इससे भारत के प्रत्येक वर्ग में अंग्रजो के प्रति अविश्वास की भावना उत्पन्न हुई और वे व्यापक विद्रोह के सूत्रधार बन गए

 

#3 राजनैतिक कारण 

ईस्ट इंडिया कंपनी कीप्रभावी नियंत्रण”, “सहायक संधिऔरव्यपगत का सिद्धांतजैसी नीतियों ने जन-असंतोष एवं विप्लव को बढ़ावा दिया

वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी राजनैतिक परिधि में लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया | इस प्रणाली में भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के प्रसार में विशेष भूमिका निभाई और उन्हें भारत का एक विस्तृत छेत्र हाँथ लगा | और इसी कारण के चलते भारतीय राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता खो दी

गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी के काल में भारत के कुछ प्रमुख देशी राज्यों झाँसी, उदयपुर, सम्भलपुर, नागपुर आदि के राजाओं के कोई पुत्र नहीं थे | भारत में प्राचीन काल से चली रही एक प्रथा के तहत योग्य उत्तराधिकारी के चयन के लिए राजा अपने मनोकूल किसी बच्चे को गोद ले सकते थे | परन्तु डलहौजी ने बिना कंपनी की आज्ञा से गोद लेने की इस प्रथा को अमान्य घोषित कर दिया और इन देशी रियासतों को कमपनी के शासनाधिकार में ले लिया | कंपनी की इस नीति से सभी राज्य के राजा असंतुष्ट थे और वे सभी एक ऐसे अवसर की तलाश में थे, जब एक बार फिर से अंग्रेजो को दबाकर वह अपनी रियासत पर अधिकार कर सकेंगे

 

#4 बाहरी घटनाओ का प्रभाव 

1857 का विद्रोह  घटनाओ- प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1838-42), पंजाब युद्ध (1845-49) और क्रीमिया युद्ध (1854-56) जिसमे अंग्रेजो का भारी हानि हुई थी, से प्रेरित हुआ | इससे यह धारणा उत्पन्न हुई की अंग्रेज अपराजेय हैं | भारत के क्रांतकारियों को इस युद्ध से नवीन आशा एवं प्रेरणा मिली की हम भी अंग्रेजो को देश से निकाल सकते हैं | और इसी पर विद्रोह शुरू हुआ जिसमे आगे क्रांति का स्वरुप ले लिया

 

#5 तात्कालिक कारण 

सेना में एनफील्ड बन्दूक के शामिल किये जाने के खबरों ने सिपाहियों के मन-मुटाव को बढ़ा दिया | नई एनफील्ड बन्दूक भरने के लिए कारतूस को दांतो से काट कर खोलना पड़ता था और अंदर के बारूद और कारतूस को बन्दूक की नली में डालना पड़ता था | कारतूस का बाहरी सतह गाय और सूअर के चर्बी से सने हुए कागज से बना था | इस चर्बीयुक्त आवरण से कारतूस में सीलन नहीं लगती थी | यह बात सिपाहियों के बीच फ़ैल चुकी थी, जिससे हिन्दू और मुस्लिम सिपाहियों के धार्मिक भावनाओ को ठेस पहुंची | गाय हिन्दूओ के लिए पवित्र थी जबकि सूअर की हत्या मुसलमानो के लिए वर्जित थी

सर्वप्रथम बैरकपुर छावनी के 34वीं रेजिमेंट के मंगल पांडेय ने 29 मार्च 1857 को ऐसे कारतूस के प्रयोग का विरोध किया और लेफ्टिनेंट बाग़ की हत्या कर दी तथा मेजर सार्जेंट हरन को घायल कर दिया | 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडेय को फांसी दे दी गई |  6 मई को सैनिकों द्वारा फिर विरोध हुआ | अब कंपनी ने भारतीय सैनिको के हथियार जब्त करने लगी, और उन्हें सजा दी जाने लगी तथा बड़ी सांख्या में कैद किया जाने लगा | अंत में 10 मई 1857 को सैनिकों ने व्यापक स्तर पर विद्रोह की घोषणा कर दी और 1857 की क्रांति की शुरुआत हो गई




 

1857 की क्रांति की शुरुआत (Revolt of 1857)

1857 Ki Kranti History in Hindi: मंगल पांडेय को फांसी देने की खबर सम्पूर्ण देश में आग की तरह फैली और क्रांति का मौहोल स्थापित हो गया | 6 मई 1857 को भारतीय सैनिकों ने फिर नए कारतूस के इस्तेमाल का विरोध किया और विरोधी सैनिकों को 10 वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई | ऐसी स्थिति में सैनिकों के लिए अंग्रेजो से बदला लेना परम कर्तव्य हो गया | मेरठ के सैनिकों ने 10 मई 1857 को ही जेलखाने को तोडना तथा अंग्रेजो को मरकर भारतीय सैनिको को मुक्त करना

मेरठ में मिली सफलता से उत्साहित सैनिक दिल्ली की ओर बढे | दिल्ली आकर क्रांतिकारी सैनिकों ने कर्नल रिप्ले को मौत के घाट उतार दिया और दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया | इसी समय अलीगढ, इटावा, आजमगढ़, गोरखपुर आदि में भी 1857 की क्रांति की घोषणा हो चुकी थी

 

क्रांति के प्रमुख के रूप में बहादुरशाह जफ़र का चुनाव 

दिल्ली में स्थानीय इंफैनटी विद्रोहियों में शामिल हो गई और उन्होंने राजनितिक एजेंट साइमन फेजर सहित कई यूरोपीय अफसर की हत्या कर शहर पर कब्ज़ा कर लिया | लेफ्टिनेंट विलोबी, जो दिल्ली में पत्रिका के इंचार्ज थे, ने कुछ हद तक विद्रोहियों का मुक़ाबला किया लेकिन जल्द ही धराशाही हो गए | वृद्ध एवं दुर्बल बहादुरशाह द्वितीय को भारत का सम्राट घोषित किया गया | जल्द ही दिल्ली इस महान 1857 की क्रांति का केंद्र बन गया

बहादुरशाह जफ़र ने थोड़ी हिचकिचाहट के पश्चात् भारत के सभी प्रमुख शासको को क्रांति में सम्मिलित होने के लिए पत्र लिखा | और उन्हें ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिए प्रेरित किया

 

विद्रोह के प्रमुख केंद्र एवं नेतृत्वकर्ता (1857 Revolt Leaders)

1857 की क्रांति के नायक: यद्यपि 1857 की क्रांति का नेतृत्व बहादुरशाह जफ़र कर रहे थे परन्तु यह नेतृत्व औपचारिक और नाममात्र था | विद्रोह का वास्तविक नेतृत्व जनरल बख्त खां के हांथो में था, जो बरेली के सैन्य विद्रोह के प्रमुख थे तथा बाद में अपने सैन्य साथियों के साथ दिल्ली पहुंचे | बख्त खा के नेतृत्व वाले दल में प्रमुख रूप से 10 सदस्य थे | बहादुरशाह जफ़र का विद्रोहियों पर तो नियंत्रण था और ही ज्यादा संपर्क | बहादुरशाह का दुर्बल व्यक्तित्व, वृद्धावस्था तथा नेतृत्व अछमता विद्रोहियों को योग्य नेतृत्व देने में सक्षम नहीं थी

कानपूर में अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब सभी को पसंद थे | उन्हें कंपनी ने उपाधि और महल दोनों से वंचित कर दिया तथा पूना से निष्काषित कर कानपूर में बसर करने को विवश कर दिया था | विद्रोह के पश्चात् नाना साहब ने खुद को पेशवा घोषित कर दिया तथा स्वयं को सम्राट बहादुरशाह जफ़र के गवर्नर के रूप में मान्यता दी | 27 जून 1857 को सर ह्यु व्हीलर ने कानपूर में आत्मसमर्पण कर दिया

लख़नऊ में विद्रोह का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया | बेगम हजरत महल का पुत्र नवाब घोषित कर दिया गया तथा समानान्तर सरकार की स्थापना की गई | यहाँ के अंग्रेजी सेना के प्रमुख हेनरी लॉरेंस ने अपने कुछ सैनिकों के साथ ब्रिटिश रेजिडेंट में शरण ली | लेकिन विद्रोहियों ने ब्रिटिश रेजिडेंट पर आक्रमण किया तथा हेनरी लॉरेंस को मौत के घात उतार दिया | अंततः नए ब्रिटिश कमांडर सर कोलिन ने गोरखा रेजिमेंट की सहायता से मार्च 1858 में नगर पर अधिकार करने में सफलता पाई और मार्च 1858 तक अंग्रेजो ने लखनऊ को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया

रोहिलखण्ड के पूर्व शासक के उत्तराधिकारी खान बहादुर ने खुद को बरेली का सम्राट घोषित किया | कंपनी द्वारा निर्धारित पेंशन से असंतुष्ट खान बहादुर अपने 40 हजार सैनिकों के साथ लम्बे समय तक विद्रोह का झंडा बुलंद रखा

बिहार में एक छोटी रियासत जगदीशपुर के जमींदार कुंवर सिंह ने यहाँ विद्रोह का नेतृत्व किया | इस 70 वर्षीय बहादुर जमींदार ने दानापुर से आरा पहुँचने  सैनिकों को ढृण नेतृत्व प्रदान किया तथा ब्रिटिश शासन को कड़ी चुनौती दी

फ़ैजाबाद के मौलवी अहमदुल्ला 1857 के विद्रोह के एक और प्रमुख नेतृत्वकर्ता थे | अहमदुल्ला मूलतः मद्रास के रहने वाले थे | बाद में फैज़ाबाद गए | 1857 के विद्रोह के अंतर्गत जब अवध में विद्रोह हुआ तब मौलवी अहमदुल्ला ने विद्रोहियों को एक सक्षम नेतृत्व प्रदान किया

1857 के विद्रोह में इन सभी नेतृत्वकर्ताओं में सबसे प्रमुख नाम झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का था, जिसने झाँसी में सैनिकों को ऐतिहासिक नेतृत्व प्रदान किया | झाँसी के शासक राजा गंगाधर राव की मृत्यु के पश्चात् लार्ड डलहौजी ने राजा के दत्तक पुत्र को झाँसी का राजा मानने से इंकार कर दिया तथाव्यपगत के सिद्धांतके अनुसार डलहौजी ने झाँसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया | इसके उपरांत रानी लक्ष्मीबाई नेमैं झाँसी नहीं दूंगीका नारा देते हुए क्रांति के मोर्चे को संभाला | कानपुर के पतनोपरांत नाना साहब के सहायक तात्या टोपे ने झाँसी पहुँचने पर लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह का आरम्भ किया

तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई की सम्मिलित सेना ने ग्वालियर की ओर प्रस्थान किया जहाँ कुछ अन्य भारतीय सैनिक भी उनकी सेनाओ में सम्मिलित हो गए | ग्वालियर के शासक सिंधिया ने अंग्रेजो का समर्थन करने का निश्चय किया तथा आगरा में शरण ली | कानपुर में नाना साहब ने स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया तथा दक्षिण में अभियान करने की योजना बनाई | जून 1858 तक ग्वालियर पूरी तरह अंग्रेजो के नियंत्रण में गया


 

विद्रोह का दमन 

1857 की क्रांति के राष्ट्रव्यापी स्वरुप और भारतियों में अंग्रेजी सरकार के प्रति बढ़ते आक्रोश  देखकर अंग्रेजी सरकार घबरा गई | क्रांति को समाप्त करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने निर्ममतापूर्ण दमन की नीति अपनाई | भारत के गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने दिल्ली की घेराबंदी के लिए पंजाब, कश्मीर आदि से सेना बुलाई | 14 सितम्बर को 6 दिन के अंदर घेराबंदी कर ली गई

निकलसन ने कश्मीरी गेट को घेराबंदी की और इस घटना पर बम्बई के गवर्नर लार्ड एल्फिस्टन ने कहा1857 की क्रांति में जिस समय दिल्ली पर दोबारा अधिकार किया गया उस समय अंग्रेजो ने इतना अपराध किया जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता” | 

हडसन ने बहादुरशाह को पकड़ने की योजना बनाई | बहादुरशाह के रिश्तेदार मिर्जा इलाही बख की मदद से बहादुरशाह जफ़र तथा बेगम जीनत को बंदी बना लिया और उन्हें रंगून के जेल में भेज दिया जहा 1862 में बहादुरशाह जफ़र की मौत हो गई | जफ़र के दो पुत्र और एक पोते की हत्या लालकिले के सामने हडसन ने करवा दी | और बचे जनरल बख्त खा, दिल्ली से लखनऊ भाग गए, जहाँ 13 मई 1859 में उनकी मृत्यु हो गई

इस घटना पर मिर्जा ग़ालिब ने कहामेरे सामने रक्त का ऐसा महासागर है, जो की खुदा ही जानता है की किसलिए मुझे भेजा ” | 

विद्रोह को अंततः कुचल दिया गया | ब्रिटिश शासन ने एक लम्बी लड़ाई एवं भयानल लड़ाई के पश्चात् 20 सितम्बर 1857 को दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया गया | और 1859 के अंत तक, भारत पर ब्रिटिश सत्ता पुनः काबिज हो गई


हडसन बहादुरशाह के दो पुत्र और एक पोते को मरने का आदेश देता हुआ



 

1857 की क्रांति के असफलता के कारण 

1. सीमित, स्थानीय और असंगठित विद्रोह 

2. अनेक देशी नरेशों और सामंतो का अंग्रेजो के प्रति राजभक्त बने रहना

3. शास्त्रों का आभाव

4. विद्रोह का पुरे देश में प्रसार होना

5. संगठन का आभाव

6. गिने चुने राजाओ ने ही विद्रोह  नेतृत्व किया

7. अंग्रेजो की यूरोपीय सेना संगठित तथा आधुनिक हथियारों से सुसज्जित थी

8. निश्चित उद्देश्य का आभाव

 

लार्ड कैनिंग ने कहायदि सिंधिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाए तो मुझे कल ही बिस्तर गोल करना होगा” | तथा यूरोपीय इतिहासकारो ने ग्वालियर के मंत्री सर दिनकर राव तथा हैदराबाद के मंत्री सालार जंग की राज भक्ति की बहुत सराहना की

 

1857 के विद्रोह का परिणाम 

1. 1 नवंबर 1858 को लार्ड कैनिंग ने विक्टोरिया के घोषणा पत्र को इल्लाहाबाद में पढ़ा

2. भारत पर सीधे ब्रिटिश क्राउन का शासन

3. कोई राज्य अंग्रेजी राज्य में नहीं मिलाया जायेगा

4. भारतीयों के धार्मिक तथा सामाजिक मामलो में हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा

5. भारतीय और यूरोपीय सैनिको का अनुपात 2:1 होगा, जोकि पहले 5:1 था |     

 

1857 की क्रांति से सम्बंधित पूछे जाने वाले प्रश्न (1857 Revolt Mcq)

1. 1857 के विद्रोह के समय भारतीय और अंग्रेजी सैनिकों का अनुपात क्या था | 

जवाब- भारतीय और अंग्रेजी सैनिको का अनुपात 2:1 

 

2. 1857 के विद्रोह का क्या प्रभाव पड़ा ?

जवाब - ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया तथा ब्रिटिश अधिकृत भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया | भारत के गवर्नर जनरल के पद की जगह नए पद वायसराय का सृजन किया गया

 

3. 1857 के विद्रोह के समय मुग़ल बादशाह कौन था ?

जवाब- बहादुरशाह जफ़र 

 

4. 1857 की क्रांति के प्रमुख केंद्र कौन कौन से है ?

जवाब- दिल्ली, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और ग्वालियर 

 

5. अवध का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कब किया गया था ?

जवाब- 1856 में लार्ड डलहौजी द्वारा 

 

6. 1857 की क्रांति कब हुई थी ? 

जवाब- 10 मई 1857 

 

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